वीजा का झमेला

गतांक से आगे

तो जनाब अब तक आपने देखा कि हमने अपना ठिकाना तो बना सॉरी यार, पसन्द कर लिया, अब मसला था वीजा प्रोसेसिंग का। चूँकि अभी तक हम बिजीनैस वीजा पर आए थे, कम्पनी ने हमे बोला कि तुम्हारी वीजा बदलवानी पड़ेगी। लिहाजा तुमको वीजा आफिसर के सामने हाजिरी लगानी पड़ेगी। मरता ना क्या करता, जाना पड़ा। बाहर लाइन मे खड़े खड़े एक बुजुर्ग नुमा व्यक्ति,जो शकल सूरत से मौलाना दिख रहे थे, ने हमे बोल दिया, तुम्हारा काम नही होगा। हमने पूछा क्यों? बोला, यहाँ के कानून के मुताबिक तुमको एक बार कुवैत से बाहर जाना होगा, फिर दोबारा इन्ट्री करवानी होगी, तब जाकर तुमको वीजा मिलेगा। ऊपर से तुमने अपने देश मे मेडिकल शेडिकल भी नही कराया है, इसलिए उसको कराने के लिए भी तुमको वापस इन्डिया जाना पड़ेगा। हम वैसे ही डरे हुए थे, ऊपर से ये मौलाना, हमने इन मौलाना को मन ही मन डेढ सौ गालियाँ निकाली, क्या कहा? इत्ती कैसे आती है? अमां हम कानपुरी है, डेढ सौ क्या डेढ हजार गालिया आती है, देते नही है तो इसका मतलब ये नही कि आती नही।

वीजा आफिसर का कमरा क्या था जी एक बहुत बड़ा हाल था, इत्ता बड़ा था कि इन्डोर क्रिकेट खेल सकें। वीजा आफिसर कमरे के दूसरे कोने पर था, और वीजा पाने वाले बन्दे (सात आठ के लॉट में) कमरे के इस कोने पर। वीजा आफिसर कुछ खड़ूस किस्म का था, मेरे सामने ही दो चार बन्दो को झाड़ चुका था। अब बोल तो वो अरबी रहा था, लेकिन लहजा डाँटने वाला ही था। हमे लगा, कि हमारी भी लग गयी आज। हमारे सिन्धियों मे एक कहावत होती है, अगर बहू को डाँटना हो तो, बहू की तरफ़ प्यार से देखते हुए, बेटी को जमकर डाँटो, बहू अपने आप समझ जाएगी। हमे लगा ये खड़ूस कंही सिन्धी दिमाग तो नही एप्लाई कर रहा। हम भी पक्के ढीठ, एकदम उल्लुओं की तरह इधर उधर देखते हुए, टाइम पास कर रहे थे। इसी बीच उस बन्दे के पास कोई फोन आ गया, बन्दे का लहजा ही बदल गया, आवाज मे एकदम मानो शहद टपकने लगा। उसने बात करते करते, अपने मातहत को बुलाया और अरबी मे कुछ कहा। मातहत मेरी तरफ़ बढा, वैसे ही वो खूंखार किस्म का दिख रहा था, उसने मेरे पास आते हुए पूछा, अंग्रेजी मे पूछा फलाना कम्पनी से कौन है, मैने अपनी मुन्डी हाँ मे हिलाई, दिमाग कह रहा था, कि बॆटा भाग ले, कुछ लफड़ा होने वाला है, लेकिन दिल ने कहा, अबे भाग के कहाँ जाएगा, जो होगा झेलेंगे। उस बन्दे ने कहा, साहब के पास जाओ। मै उस आफिसर के करीब गया, उसने तपाक से हाथ मिलाया और सामने वाली सीट पर बैठने को कहा।

हम समझ नही पा रहे थे कि ऐसा क्या जादू हो गया, कंही उसकी बीबी का फोन तो नही आ गया? जो उसकी आवाज मे शहद घुल गया। बाद मे पता चला कि मेरी कम्पनी से किसी ने फोन किया था, अब किसने किया था, हमे क्या पता, हमारा काम तुरत फुरत हो गया। उसने हमे फिर अपने आदमी के साथ मेडिकल करवाने भेजा। बाहर मौलाना फिर मिल गए, बोले “देखा! हमने कहा था ना, काम नही होगा। अब जाओ बेटा वापस” हमने उनकी तरफ़ शरारत भरी इस्माइल फैंकी, जिससे मौलाना और बौखला गए। हमने कहा “चचा! काम हो गया, अब मेडिकल के लिए जा रहा हूँ, ना मानो तो इस झाड़िए (आफिसर का अरबी बन्दा) से पूछो। मौलाना बोले, ये नामुमकिन है। बाकी काम झाड़िए ने सम्भाला, उसने मौलाना को अरबी मे कुछ बताया, जिससे मौलाना बस हाँ हाँ मे सिर हिलाते सुने देखे गए।

मेडिकल मे भी काम जल्दी जल्दी निबटा दिया गया, झाड़िया जैसा बन्दा जो साथ था। बन्दे ने वापस मेरे को आफिस छोड़ा, आफिस पहुँचकर, मैने मैनेजर को सारी बात बतायी। मैनेजर सिर्फ़ मन्द मन्द मुस्कराता रहा, हम समझ गए, हो ना हो इस सारी कारस्तानी/कारगुजारी के पीछे इस मैनेजर का ही हाथ है। खैर जनाब, वीजा का झमेला तो सुलट चुका था, अब बारी थी घर सजाने की, अब वो बीबी के बगैर कैसे होता, सो फैमली वीजा का जुगाड़ देखना था। लेकिन भई फैमिली वीजा का जुगाड़ तो तब होता ना जब मेरी रेजीडेंसी मेरे पासपोर्ट पर लग जाती, सोशल सिक्योरिटी कार्ड यहाँ पर इसे बताखा मदनिया बोलते है, मिल जाता। अब बताखा मदनिया तो तभी मिलता ना जब घर का कान्ट्रेक्ट हो जाता। तो मिलाकर कहानी जहाँ से शुरु हुई थी, वही पर पहुँच गयी। अब मकान के लिए भी उस मुए सर्विसेस डिपार्टेमेन्ट को साधना था जो पहले भी काफी पंगे कर चुका था। खैर मैनेजर ने चिट्ठी लिखवा दी थी, हमने भी कमर कस ली थी, सर्विसेस डिपार्टमेन्ट से दो दो हाथ करने के लिए। हाउसिंग कान्ट्रेक्ट मे क्या क्या पंगे हुए, वो अगली पोस्ट में।

जारी है अभी…….

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8 टिप्पणियाँ

Filed under जीवन का सफ़रनामा

8 responses to “वीजा का झमेला

  1. Shrish

    रुचिकर ! ये ब्लॉग कुछ ही समय पहले नजर में आया। कुवैत कथा के लिए अलग से ब्लॉग बनाने का कुछ खास मकसद था क्या।

    लगता है धारावाहिक पोस्टों के दिन आ गए। सभी भाई किस्तों में लिखने लगे हैं तो हम पीछे क्यों रहें जल्द ही डेली सोप शुरु करते हैं।

  2. अरे पंडितजी, पधारो म्हारे देस।
    हुआ ये कि, हमे बहुत बुजुर्गो ने कहा कि अपनी आत्मकथा लिखो (पता नही हमे मारकर अमर करने का इरादा था उनका) हमने कोशिश की। गाड़ी को धक्का मारा गया, पिछले साल इसी दिन, अटक कर बन्द हो गयी। आज बरसी थी, सो आगे लिखना शुरु किया गया है। अब देखो कब तक चलता है इ सब।

  3. पिछले साल इसी दिन, अटक कर बन्द हो गयी। आज बरसी थी, सो आगे लिखना शुरु किया गया है।
    तभी मैं सोच रहा था कि यह अचानक जीतू भाई को क्या हो गया है पिछले पढ़े लेख फ़िर से क्यों पढ़वा रहे हैं।
    बढ़िया है अब इसे रोकिये मत…

  4. साल भर बाद पधारे, लेकिन सही पधारे. अब जारी रहो और कथा बांचते रहो.

  5. पिंगबैक: Global Voices Online » Blog Archive » Hindi Blogoshere: From freedom of speech to blog theft!

  6. मजा आ गया( कुबैत में आपके हालात पर नहीं बल्कि आपका लिखा पढ़कर) जीतु भाई, कौन कहेगा कि आप साफ़्ट्वेयर लाईन से हो, आपका लिखा हुआ पढ़ कर तो यही लगता है कि आप लेखकों की ही जमात से हो।
    जारी रखें…

  7. sudhir

    जी क्या बात है | इसे आप वीसा का चक्कर कहेंगे तो फिर मेरे साथ जो हो रहा है उसे क्या कहेंगे? अमेरिका के वीसा के चक्कर में इतनी जान ख़ाप रही है की क्या कहूँ!
    सुधीर
    quillpad.in से हिंदी मैं लिखना, अब बहुत आसान

  8. Please send me an invite too!! I love the new screenshots and can’t wait for the beta program to start!https://ameo.link/barbarapope8512808180

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