मसला ए रिहाइश

पिछले अंक से आगे

सबसे पहले तो मै आप सभी से माफ़ी चाहता हूँ, कि काफी दिनो बाद लिख रहा हूँ, क्या करूं कुछ जरुरी मसले थे जिनको निपटाने के बाद ही कुछ लिखने लायक कन्डीशन मे आ पाया हूँ। तो जनाब फ़िर से शुरु करते है जहाँ से खतम किया था।यानि कि मसला ए रिहाइश।

होटल के बिल का मसला तो सुलझ गया था, लेकिन फ़िर भी मन के किसी कोने मे लग रहा था, कि जेब में पैसे अभी भी कम हैं, कंही ऐसा ना हो कि कोई पंगा हो जाय। इन्ही उधेड़बनो मे बैठा था कि हिन्दुस्तान से फ़ोन आ गया, कि क्या हालचाल है, अभी हम(फ़ैमली) को बुलाने मे कितने दिन लगाओगे। दरअसल मुझे तो पता नही था, कि यहाँ वीजा का क्या तरीका है इसलिये घर पर पहले ही वादा कर आये थे, कि जाते ही हफ़्ते भर के अन्दर तुम दोनो (दोनो का मतलब? ओफ़्फ़ो, अमां यार बीबी एक ही है, और एक बच्ची है। आप भी ना, जाने कहाँ कहाँ तक सोच लेते है।) को बुला लूंगा। मैने बीबी को समझाया कि थोड़ा समय और लगेगा, मेरी वीजा प्रोसेस होते ही मै तुम लोगों की वीजा भेज दूंगा। अब मुझे क्या पता था, वीजा वालों के बताया, कि वीजा तभी मिलेगा जब अपना घर बनाओगे, मतलब मकान किराये पर लोगे। अब तो जोर शोर से मकान ढूंढने का दौर शुरु हुआ। आफ़िस पहुँचते ही असलम भाई (ड्राइवर) का फोन आ जाता कि जनाब चलिये (असलम भाई पाकिस्तानी हैं, इसलिये उर्दू बोल लेते हैं) ढूंढने निकले। असलम भाई वैसे तो बहुत मस्त आदमी थे, लेकिन कभी कभी हिन्दुस्तान पाकिस्तान की बहस मे उलझ जाते थे। उस समय वो गाड़ी बहुत तेज तेज चलाना शुरु कर देते थे। हमने उन्हे छेड़ना ठीक नही समझा।

तो सुबह सवेरे हम निकल पड़ते थे। आफ़िस सात बजे का था, थोड़ा काम निबटाकर लगभग दस से बारह बजे तक हम मकान देखते थे। वापस आफ़िस आ जाते थे, क्यों? खाना खाने आपके घर जाते क्या? खैर पाँच बजे असलम भाई फ़िर से गाड़ी लेकर होटल पहुँच जाते और फिर शुरु हो जाता मकान देखने का दौर। कुवैत मे कोई भी बाहरी व्यक्ति (Expatriate) मकान/फ़्लैट खरीद नही सकता, इसलिये किराये पर ही लेना पड़ता है। वैसे भी अगर खरीदने की आज्ञा होती भी तो अपनी औकात मे नही होता। मकान देखने के चक्कर मे हमने पूरा शहर देख मारा। यहाँ काफ़ी एरिया तो कुवैती एरिया है, और बहुत सारे एरिया एक्स्पैट्रीयेट एरिया कहलाते है, जिसमे राष्ट्रीयता के हिसाब से लोग रहते है। जैसे डाउनटाउन कुवैत मे फिलीपीनोज रहना पसन्द करते है, क्योंकि वो लोग यहाँ पर कार बहुत कम खरीदते है, पब्लिक ट्रान्सपोर्ट से ही काम चलाते हैं। वैसे बिना कार के कुवैते मे एक जगह से दूसरी जगह जाने मे काफ़ी परेशानी होती है, ये परेशानी तब और दोगुनी हो जाती है, जब फ़ैमली साथ हो।भारतीय और पाकिस्तानी एक साथ एक एरिया मे रहते है। यहाँ पर मिनी इन्डिया बसा हुआ है जिसे सालमिया कहते है। समुन्दर के किनारे बसा ये एरिया साउथ एशियन लोगों की मनपसन्द जगह है, लेकिन यहाँ मकान मिलना उतना आसान नही होता, क्योंकि अव्वल जो मकान है, मकान मुश्किल से खाली होते है और जो वो है भी बहुत महंगे किराये पर मिलते है।यहाँ रहकर आपको लगेगा ही नही कि आप हिन्दुस्तान से बाहर है। हर तरफ खाने पीने की दुकाने, हैयर कटिंग सैलून और इन्डियन ग्रासरीज स्टोर, एकदम हिन्दुस्तान/पाकिस्तान वाला माहौल।बहुत सोच विचार कर हमने सालमिया में बसने का निश्चय किया।

हमने कई मकान देखे सालमिया मे, कुछ हमने रिजेक्ट किये कुछ असलम भाई ने(असलम भाई हमारे हाउसिंग कन्सल्टेन्ट जो थे), आखिरकार हम दोनो को एक मकान पसन्द आ ही गया। मेन रोड पर बनी ये बिल्डिंग बहुत अच्छी कन्डीशन मे थी, अन्दर का नक्शा भी बहुत सही था और कन्स्ट्रक्शन क्वालिटी और फ़िटिंग बहुत अच्छी थी, हमने तो पहली नजर मे ही डन कर दिया। असलम भाई ने सैकड़ो सवाल दाग दिये हैरिस से। अब ये हैरिस कौन है, बताता हूँ यार,ठहरो तो। हैरिस बोले तो एक तरह का चौकीदार कम सफ़ाई वाला कम मैन्टीनेन्स वाला कम किराया वसूलीदार कम मकानमालिक का प्रोक्सी। हैरिस और भी बहुत सारे काम करता है, अब हम हैरिस पर लिखने लगेंगे तो पूरा ब्लॉग भर जायेगा, इसलिये इतना परिचय ही काफ़ी है।

वैसे हमे हैरिस का प्रोफ़ाइल बहुत सही लगा। हर बिल्डिंग मे एक हैरिस होता है जो सफ़ाई, मैन्टीनेन्स,किराया वसूली और सारे काम करता है। अक्सर ये अरबी होती है, यमन ,इजिप्ट और दूसरी गरीब मुल्को से आये बाशिन्दें। लेकिन कुछ जगहों पर ये काम पाकिस्तानी लोग भी करते है। हमारा हैरिस ईरान से सटे पाकिस्तानी बार्डर का था, सो उसे उर्दू, पर्शियन और अरबी अच्छी बोलने आती थी। ये हमारे लिये वरदान भी था और श्राप भी। वरदान इसलिये कि हम एक दूसरे की बात आसानी से समझ सकते थे, श्राप इसलिये कि असलम भाई हैरिस को गालियां नही निकाल सकते। हैरिस ने असलम भाई के सारे सवालों के जवाब सहजतापूर्वक दिये। हालांकि असलम भाई ने हैरिस को पकाने मे कोई कसर नही छोड़ी थी, लेकिन वो बहुत सहनशील निकला। असलम भाई ने भी डन कर दिया। और इस तरह हैरिस के साथ साथ मकान भी पास हो गया।हैरिस के साथ साथ हमने भी चैन की सांस ली, हैरिस ने क्यों अमां यार वो भी असलम भाई को झेलते झेलते पक गया था।हम हैरिस को अपनी कम्पनी की हाउसिंग डिपार्ट्मेन्ट का कार्ड देकर और उससे उसके आफ़िस का नम्बर लेकर आ गये। इस तरह रिहाइश का मसला सुलझा। लेकिन हमे क्या पता, अब वीजा प्रोसेस मे बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी, उसकी कहानी अगली बार।

अगले अंक मे जारी है
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5 टिप्पणियाँ

Filed under जीवन का सफ़रनामा

5 responses to “मसला ए रिहाइश

  1. पिंगबैक: जीतू की कलम से » Blog Archive » चिन्ता और समाधान

  2. लेख उतना बुरा नहीं जितना हम या तुम भी समझ रहे होगे।जैसे ये हैरिस हैं वैसे हमें एक मिले थे टेल्को में। पूछा क्या करते हो? बोले-हम पानी पिलाते हैं,सफाई करते हैं,ब्वायलर धोते हैं। क्या नहीं करते? हमें लगा कि अगर ये चला जायेगा तो टेल्को बंद हो जायेगी। जरा जल्दी लिखा करो ना जी।

  3. मजेदार कहानी चल रही है, यार अब आगे भी तो बढ़ो!!

  4. अरे ये कहानी तो यहीं रुक गई।
    आगे बढो भैया।

  5. पिंगबैक: वीजा का झमेला « जीतू की कलम से

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