अजनबी देश, अनजाने लोग

पिछले अंक से आगे

नहाने के बाद सबसे पहले तो मैने चाय मंगवाई। मेरा कमरा होटल की चौदहवी मंजिल पर था। कमरे मे एक तरफ़, शाही सा डबल बैड था, दूसरी तरफ़ एक शीशे की दीवार के साथ साथ एक आरामदायक सोफ़ा सैट पड़ा था। शीशे की दीवार के पार समुन्दर का शानदार नजारा दिखाई दे रहा था। ये होटल समुन्दर से ज्यादा दूर नही था, वाकिंग डिस्टेन्स थी। बीच मे एक बड़ी सी सड़क पड़ती थी। ये होटल डाउनटाउन कुवैत सिटी मे था, सड़क के दूसरी तरफ़ एक बहुत ही शानदार शोरूम था, नाम था, जशनमल । नाम कुछ जाना पहचाना सा लगा। खैर इतने मे दरवाजे पर दस्तक हुई और रूमसर्विस वाला चाय ले आया था, मैने साथ मे कुछ हल्का सा नाश्ता भी मंगवाया हुआ था, सोफ़े पर बैठ बैठे और दूर समुन्दर का नजारा देखते देखते कब चाय खत्म हो गयी, पता ही नही चला। मैने अपनी डायरी निकाली और कम्पनी के नम्बर वगैरहा पता किये। फ़ोन पर मेरा मैनेजर मिला, वही इन्डिया आया था, इन्टरव्यू लेने। उसने कहा “आज वैसे भी वीकेन्ड है तुम आराम करो, सनडे से ज्वाइन कर लेना” लेकिन मैने कहा मै आफ़िस आना चाहता हूँ, उसने मेरे को रास्ता समझाया और मै आफ़िस पहुँचा।

आफ़िस जाकर, मैने बाकी सहकर्मियों का परिचय प्राप्त किया। मैनेजर मे मुझे ज्यादा कुछ करने नही दिया, बोला कि चिन्ता मत करो, तुम्हारी ज्वाइनिंग हो गयी है, आज का दिन तुम होटल मे आराम करो, कल और परसों वीकेन्ड की छुट्टी है दोनो दिन कुवैत घूमों-फ़िरो मौज करो, रविवार को ड्यूटी पर आओ। मैनेजर वापस मेरे को होटल तक छोड़ने आया, आते समय वो मेरे को आसपास की जगहो के बारे मे बता गया। समय था, लगभग साढे ११ बजे का। अब मैं निट्ठल्ला बैठे बैठे करता क्या? निकल पड़ा, बाकी जगहों का तो पता नही था, सीधा समुन्दर किनारे पहुँच गया। दिन गरम था,लेकिन हवा मे अभी भी उतनी गर्मी नही थी। समुन्द्र किनारे एक रेस्टोरेंट था, जहाँ बैठ कर लगभग घन्टा भर, चाय की चुस्कियों के साथ, समुन्दर की आती जाती लहरों को देखता रहा। ये लहरें मुझे बहुत अच्छी लगती है, नीला समुन्दर, उठती लहरें जीवन मे उल्लास भर देती है। जीवन भी इन लहरों के समान होता है, ना जाने कितने हिचकोले खाने के बाद, आप किस किनारे पहुँचे पता ही नही चलता। इसी उधेड़बुन मे एक घन्टा कब निकल गया, पता ही नही चला,अब भूख भी लगने लगी थी, खाने का समय भी हो चला था। मै जिस रास्ते से बीच पर गया था, उसी रास्ते से वापस होटल लौट आया। अब फ़ैमिली की बहुत याद आ रही थी।मुझे यकायक चन्दन दास द्वारा गाई एक गज़ल याद आ गयी:

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते…मेरी तनहाई पर मुस्कराते रहे।
मै बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे।

फ़्लाइट की बातों की याद

खाना खाकर, आलस सा आने लगा था, सो मै चादर तान कर सोने की कोशिश करने लगा।सोने से पहले मुझे फ़्लाइट की बाते याद आ रही थी, बहुत मजेदार घटनाये घटी थी। हुआ यूं कि मेरे साथ वाली सीट पर एक बन्दा बैठा था, जो बहुत घबराया हुआ था, शायद वह पहली बार हवाई जहाज मे चढा था।मैने उसको सीट बैल्ट बांधने मे मदद की। फ़्लाइट के दौरान, वो बन्दा हर वो हरकत कर रहा था, जो मै कर रहा था। खाने पीने मे नकल करना तो ठीक था, लेकिन हर चीज मे उसे मेरी नकल करते देखना बहुत अझेल लग रहा था। मैने एयर होस्टेज को साफ़्ट ड्रिंक लाने के बोला तो उसने भी वही आर्डर किया, यहाँ तक तो ठीक था, मेरे सर मे दर्द था, इसलिये मैने एस्प्रिन मांगी तो उसने भी मांगी, मैने एस्प्रिन ली तो उसने भी ली, अब मुझसे रहा नही गया। मैने पूछ ही लिया, भाई साहब, आप का चाहते हो? काहे हमारा भेजा खराब किये हो, नकल कर कर के। वो बोला, माइबाप, , पेशे से दर्जी हूँ, कुवैत मे मेरे भाईसाहब रहते है, उन्होने ने ही वीजा देकर बुलाया है, पहली बार तो घर से बाहर निकला हूँ, हवाई जहाज तो बहुत दूर की बात है, एसी ट्रेन मे भी आज ही बैठा था, इसलिये मुझे यहाँ जहाज के बारे मे कुछ आइडिया नही है, आपको देख देखकर ही मै नकल कर कर के, समझने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन साथ मे उस पर तरस भी आया। अब क्या करता, सारे रास्ते उसको झेलता रहा, चुपचाप। लेकिन अब याद कर रहा था, तो उस बन्दे के एक एक एक्शन को याद करके करके हंसी आ रही थी।

कुवैत दर्शन

किसी भी शहर का परिचय जानने का मेरा अपना तरीका है,मै बस/लोकल ट्रेन द्वारा उस शहर का चप्पा चप्पा देख मारता हूँ, इससे बाकी कुछ हो ना हो,आपको शहर के नक्शे से परिचय हो जाता है साथ ही सहयात्रियों के आचार विचार,व्यवहार से शहर मे रहने वाले लोगों की एक झलक भी मिल जाती है। मैने पास के बस टर्मिनल से एक रूट के आखिरी स्टाप की टिकट ली(कुवैत मे बस के रेट स्टैन्डर्ड है, चाहे जहाँ से चढो, चाहे जहाँ उतरो) और आखिरी स्टाप से वापस, शुरुवात के स्टाप तक आया। खिड़की वाली सीट पर बैठकर मै बाहर के नजारे देखता रहा और साथ ही शहर का नक्शा अपने दिमाग मे बैठाता रहा। रास्ते मे चढने और उतरने वाले यात्रियों, जिसमे से ज्यादातर साउथ एशिया(भारत,पाकिस्तान,श्रीलंका,बांग्लादेश) से थे, उनसे बातचीत करता रहा और सभी ने विचार जानने की कोशिश करता रहा। अभी तक दीनार और फ़िल्स (पैसों के बराबर करैन्सी) का आइडिया नही था, इसलिये बस मे चढते वक्त, सारे खुल्ले पैसे अपने हथेली पर रख देता, ड्राइवर अपने आप ईमानदारी से १५० फ़िल्स ले लेता और बाकी के चेन्ज वापस मेरी हथेली पर रख देता। बहुत सही हिसाब किताब चल रहा था, रोजाना मै, शाम को इस प्रक्रिया को दोहराता, इस तरह से मैने शहर के दूर दराज के एरिया भी देख डाले। कुवैत मे लगभग सारी बसे एयरकन्डीशन्ड होती है, सिवाय एक दो रूट के। सबका किराया एक सा है, १५० फ़िल्स, चाहे जहाँ जाओ। कन्डक्टर नाम की चीज यहाँ नही होती, ड्राइवर ही कन्डक्टर होता है, आपको बस का टिकट खुद लेना होता है,ड्राइवर कभी आपके पास नही आयेगा। हाँ बीच बीच टिकट चैकर जरुर चढता है, जो रैन्डमली टिकट चैक करता है और बिना टिकट पकड़े जाने पर बहुत लम्बा चौड़ा फ़ाइन होता है। खैर अपने साथ ऐसा कोई हादसा नही हुआ। बस मे आगे वाले गेट से चढते है, आगे की कुछ सीट्स लेडीज के लिये छोड़ी जाती है, तीन चार सीट के बाद, आप बैठ सकते है। बस अपने स्टाप के अलावा कंही नही रूकती, स्टाप आने से पहले आपको गेट के पास पहुँचना होता है।

कुवैत में सड़के बहुत चौड़ी और हाइवे बहुत फ़ास्ट स्पीड वाले होते है। हर तरफ़ एक से बढकर चमचमाती कारे दिखती है और चारो तरफ़ हरियाली ही हरियाली दिखती है।कुवैत अरेबियन गल्फ़ के आखिर मे छोटा सा देश है। जो दो तरफ़ सउदी अरब और एक तरफ़ ईराक से घिरा है, चौथी दिशा मे समुन्दर(अरेबियन गल्फ़) है, समुन्दर के उस पार ईरान है। कुवैत विभिन्न एरिया (जिन्हे यहाँ अलग अलग शहर माना जाता है), जैसे कुवैत सिटी,फ़ाहहिल,सालमिया,अहमदी, जाहरा, शुवैख मे बंटा हुआ है।कुवैत सिटी डाउनटाउन है, जहाँ विभिन्न आफ़िसेस है, फ़ाहहिल पोर्ट के पास बसा शहर है और इसके पास ही बसे अहमदी मे पेट्रोलियम रिफ़ाइनरी वगैरहा है। जाहरा ईराक के बार्डर पर बसा शहर है, जहाँ आज भी कुवैत के अतीत की झलक देखी जा सकती है।सालमिया एक तरह से मिनी इन्डिया है। शापिंग माल वगैरहा यहाँ बहुतायत मे है, इसे शापिंग डिस्ट्रिक्ट भी माना जा सकता है।शुवैख इन्डस्ट्रियल टाउन है, जहाँ सारे कारखाने,गैराज,गोदाम वगैरहा है।कुवैत की आबादी ज्यादा नही है, लगभग २० लाख की आबादी है, जिसमे आधी तो बाहर से आकर काम करने वाले लोगों की है। बाहर से आने वाले, एक्सपेक्ट्रियेट मे सबसे ज्यादा भारतीय और इजिप्शियन है। भारतीय लोगों की यहाँ काफ़ी इज्जत है, क्योंकि कुवैत और भारत के सम्बंध बहुत घनिष्ठ है। सारे तकनीकी कामों के लिये भारतीयों को वरीयता दी जाती है।कुवैत का इतिहास बहुत ज्यादा पुराना नही है, १९४० से पहले यह एक बहुत ही अन्जाना सा देश था,और उस समय यहाँ पर इन्डियन करैन्सी ही चलती थी। तेल मिलने के बाद, इसका महत्व बहुत बढ गया और रातो रात ये अमीर देशों की कतार मे जा खड़ा हुआ।छोटा देश होने की वजह से इसकी GDP भी बहुत अच्छी है, ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ देखिये। या फ़िर गूगल मे कुवैत सर्च करिये

अगले अंक मे जारी

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6 टिप्पणियाँ

Filed under जीवन का सफ़रनामा

6 responses to “अजनबी देश, अनजाने लोग

  1. ये भी पढ़ लिया। अगले का इंतज़ार है, मजबूरन।

  2. sahi hai kuwait ke bare main dhero details mil rahe hain. Jara likhiye ki kuwait main bharitaya junta kaise hai, kahan rehti hai, karya pranali kya kya hai, IT sector ki kya halat hai, VISA milne ka kya jariya hai. Akhir options hamesha khule rakhne padte hain hum banjaro ko.

  3. पिंगबैक: जीतू की कलम से » चल उड़ जा रे पंछी…..

  4. पिंगबैक: जीतू की कलम से » चिन्ता और समाधान

  5. एक सांस में पढ गया।

  6. yusuf

    abe ek saath likh dal me bhi kuwait me rahta hu

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