November 7, 2005...11:23 am

चिन्ता और समाधान

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पिछले अंक से आगे

मै अच्छा खासा अपना समय व्यतीत कर रहा था। होटल मै बैठकर मुफ़्त की रोटियां तोड़ रहा था। लेकिन रुकिये….यहां पंगा हो गया था, वो भी एक नही दो दो ।एक तो फ़ाइव स्टार का खाना,फ़िर ऊपर से अरेबियन टेस्ट का, एक दो दिन तो अच्छा लगा, लेकिन ज्यादा दिन मै वो खा पाने मे असमर्थ था। मैने आसपास किसी इन्डियन रेस्टोरेन्ट को ढूंढना शुरु किया। ज्यादा दूर नही जाना पड़ा, थोड़ी सी ही दूर पर एक इन्डियन रेस्टोरेन्ट था, जहाँ पर घर के स्वाद का इन्डियन भोजन मिलता था। मै सुबह नाशते मे तो फ़ल वगैरहा ले लेता था, लंच किसी तरह अरबी फ़ूड झेल लेता था, मगर शाम को डिनर करने के लिये उसी इन्डियन रेस्टोरेंट पर जाया करता था। लौटते वक्त अच्छी खासा टहलना भी हो जाता था। मगर एक दिन मै अपने कमरे मे बैठा था, तो रिसेप्शन से फ़ोन आया,रिसेप्शन वाले बन्दे ने पूछा कि क्या मै अगले हफ़्ते भी यहाँ रहने वाला हूँ, मैने कहा, कम्पनी जब तक चाहेगी, तब तक तो मै यही चिपका रहूंगा, लेकिन उसके दूसरे प्रश्न ने मुझे हैरान और परेशान कर दिया, उसने पूछा कि आप पैमेन्ट क्रेडिट कार्ड से करेंगे या कैश। मै सकपका गया, अभी तक तो मै यही समझ रहा था कि मै कम्पनी का मेहमान हूँ और कम्पनी ही सारा खर्च उठायेगी। मैने फिर भी पूछ लिया कितना चार्ज है, उसने जो चार्ज बताया तो मेरे पैरो की नीचे से तो जमीन खिसक गयी, आंखो के सामने अंधेरा छाने लगा और मुझे गश आते आते रह गया। क्योकि जेब मे कुल जमा मिलाकर पैसों से सॉरी डालरों से उसके दो दिनो का पैमेन्ट भी नही हो सकता था।मैने अपने आप को सम्भाला और उसे टालते हुए बोला कि मै कम्पनी से बात करके ही कुछ बता सकूंगा। उस रात मै सो नही सका। सुबह होते ही सबसे पहले मैने ये मसला अपने मैनेजर के सामने उठाया।

मैनेजर ने पूरी बात सुनी और ढेर सारी गालियाँ हाउसिंग विभाग (दरअसल हाउसिंग विभाग ही कम्पनी के मेहमानो की आवभगत के लिये जिम्मेदार होता है) के हैड के लिये निकाली। तुरन्त सैक्रेटरी को बुलवाया और एक लम्बा चौड़ा फ़ैक्स हाउसिंग वालो को भेजा, फ़ैक्स क्यों? अमां हमे क्या पता? हम तो खुद नये नये है, थोड़े पुराने हो तो बता सकेंगे।अब इतने दिनो बाद जाकर मैं अनुमान लगा सका हूँ, आमने सामने गालियों का आदान प्रदान नही हो सकता और चूंकि लोकल काल फ़्री है, इसलिये सारा सरकारी महकमा गाली गलौच सॉरी पत्राचार के लिये फ़ैक्स को ज्यादा प्रयोग करता है।हाउसिंग वाले ने जवाबी फ़ैक्स भेजा(मुझे उनका जवाबी कीर्तन बहुत अच्छा लगा यानि इधर शेर दगा नही, उधर से नज्म फ़ायर हुई) जिसमे माफ़ी मांगी गई थी, और असुविधा के लिये खेद प्रकट किया गया था, अब सारा कुछ अरबी मे था, लिहाजा मेरे पल्ले कुछ नही पड़ा। थोड़ी देर मे एक और फैक्स आया जिसमे होटल वाले को निर्देश दिया गया था, कि रहने का बिल कम्पनी देगी, मेहमान को कुछ नही बोला जाय। ये भी अरबी मे था, इसलिये मेरे ऊपर से निकल गया।

मैनेजर के निर्देशानुसार मै फैक्स लेकर होटलवालों के पास पहुँचा, होटल वालों ने दो खबरें सुनाई, एक अच्छी और एक बुरी, अच्छी ये कि होटल मे रहने का बिल कम्पनी देगी और बुरी ये कि खाने पीने का बिल मुझे देना होगा। अब मुझे भी धीरे धीरे यकीन होने लगा था कि हाउसिंग वाले सचमुच मे कमीने टाइप के इन्सान है।मैने खाने का बिल खुद देने का निश्चय किया, लेकिन अगले दिन मैनेजर ने पूछ लिया, कि खाने और आईएसडी टेलीफ़ोन काल वगैरहा के बिल कौन दे रहा है, मैने कहा कि मै, तो वो फ़िर भड़क गया, फ़िर गाली गलौच, फैक्स, फिर जवाबी फैक्स,माफ़ीनामा, होटल वाले की अच्छी और बुरी दो खबरे।इस बार बुरी ख़बर ये थी कि लान्ड़्री का बिल मुझे देना होगा, मैने चुपचाप लान्ड़्री का पैमेन्ट होटल वाले को कर दिया, इस बार मैने ये मसला मैनेजर को न बताने का निश्चय किया, नही आप भी झेल जाते…फ़िर गाली गलौच,फैक्स, फिर जवाबी फैक्स,माफ़ीनामा, होटल वाले की अच्छी और बुरी दो खबरे।देखा मैने आपको इतना झिलाने से बचा लिया।हाँ अब मै अपने पहला वाला वाक्य कह सकता है कि अब मै आराम से होटल मे बैठकर कम्पनी के खर्च पर मुफ़्त मे रोटियां तोड़ रहा था।

आशियाने की तलाश

अब मसला था होम सिकनैस का।घर परिवार की याद आ रही थी, वैसे भी फ़ाइव स्टार होटल मे रह रहकर घुटन हो रही थी, वही स्टाफ़ की नकली मुस्कराहट, कारीडोर मे सन्नाटा, अजनबी से लोग, और खाना(कब तक झेले इतना हाई कैलोरी फ़ूड) और फ़िर सारे माहौल मे अजीब सी महक(मै तो इसे गन्ध ही मानता हूँ) कुल मिलाकर फ़ुल्ली बनावटी माहौल।फ़िर अकेले रह रहकर भी उकता गया था, इसलिये कम्पनी को बोला कि जल्द से जल्द मकान की व्यवस्था करे। अब मकान की व्यवस्था भी उसी डिपार्टमेन्ट के हाथ थी, यानि हाउसिंग डिपार्टमेन्ट। कम्पनी ने एक गाड़ी और एक हाउसिंग वाला बन्दा मेरे साथ लगा दिया, ताकि मै पूरे शहर मे घूम घूम कर मकान देख सकूं। अब आफ़िस से आने के बाद, मिशन आशियाना शुरु होता था, यानि कि मकान की खोज। पूरे कुवैत मे मकान ढूंढते मुझे फ़िल्म घरौंदा का एक गीत याद आ रहा था:

एक अकेला इस शहर में, रात मे और दोपहर में।
आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है।

अब मकान की व्यवस्था के साथ साथ, मेरी रेजिडेन्सी वीजा की प्रोसेसिंग भी होनी थी, और पता नही किस्मत मे और क्या क्या लिखा था। इसी बीच मुलाकात हुई मिर्जा साहब से। ये किस्सा आगे बयां होगा। आज के लिये इतना ही।

अगले अंक मे जारी है

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